द्वितीय विश्व युद्ध
द्वितीय विश्व युद्ध (1939–1945) मानव इतिहास का सबसे विध्वंसकारी और सर्वाधिक व्यापक सैन्य संघर्ष था, जो नाज़ी जर्मनी, जापानी साम्राज्य और इटली के राज्य के नेतृत्व वाली धुरी शक्तियों तथा ब्रिटेन, सोवियत संघ, संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन गणराज्य के नेतृत्व वाले मित्र राष्ट्रों के बीच लड़ा गया। इस युद्ध में 30 से अधिक देशों के 10 करोड़ से अधिक लोग सीधे शामिल हुए और अनुमानतः 7 से 8.5 करोड़ लोग मारे गए, जिनमें अधिकांश आम नागरिक थे। इस युद्ध ने विश्व की राजनीतिक व्यवस्था को मौलिक रूप से बदल दिया—यूरोपीय औपनिवेशिक साम्राज्यों का पतन हुआ, संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ परस्पर प्रतिद्वंद्वी महाशक्तियों के रूप में उभरे, और संयुक्त राष्ट्र संगठन की स्थापना हुई।
पृष्ठभूमि
द्वितीय विश्व युद्ध की जड़ें प्रथम विश्व युद्ध के बाद अनसुलझी तनावों और 1919 की वर्साय संधि में निहित थीं। इस संधि ने जर्मनी पर भारी मुआवज़े, क्षेत्रीय हानियाँ और सैन्य प्रतिबंध थोपे, जिससे जर्मन जनता में गहरा आक्रोश फैला। 1929 से प्रारंभ महामंदी की आर्थिक तबाही ने यूरोप भर में लोकतांत्रिक सरकारों को अस्थिर कर दिया और चरमपंथी विचारधाराओं के उत्थान को बल दिया।
जर्मनी में 1933 में एडोल्फ हिटलर और नाज़ी पार्टी सत्ता में आए, जिन्होंने क्षेत्रीय विस्तार, सैन्यीकरण और "आर्य श्रेष्ठता" तथा घोर यहूदी-विरोधी जातीय विचारधारा पर केंद्रित एक आक्रामक कार्यक्रम को बढ़ावा दिया। इटली में बेनिटो मुसोलिनी की 1922 में स्थापित फ़ासीवादी सरकार ने भूमध्यसागर और अफ़्रीका में साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाएँ पालीं और 1935 में इथियोपिया पर आक्रमण किया। जापान में तेजी से सैनिकीकृत सरकार ने पूर्वी एशिया पर प्रभुत्व की नीति अपनाई, जो 1931 में मंचूरिया पर आक्रमण से प्रारंभ हुई और जुलाई 1937 में मार्को पोलो ब्रिज घटना के बाद चीन के विरुद्ध पूर्ण युद्ध में बदल गई।
ब्रिटेन और फ़्रांस ने मुख्यतः शमन नीति (appeasement) अपनाई, जिसका प्रतीक सितंबर 1938 का म्यूनिख समझौता था, जिसके अंतर्गत जर्मनी को चेकोस्लोवाकिया के सुडेटेनलैंड क्षेत्र को हड़पने की अनुमति दी गई। मार्च 1939 में जर्मनी ने चेकोस्लोवाकिया का शेष भाग भी अधिकृत कर लिया, जिससे स्पष्ट हो गया कि हिटलर की महत्वाकांक्षाओं को बातचीत से नहीं रोका जा सकता। 23 अगस्त 1939 को जर्मनी और सोवियत संघ के बीच मोलोटोव-रिबेंट्रॉप संधि हुई, जिसमें गुप्त रूप से पूर्वी यूरोप को प्रभाव क्षेत्रों में बाँटा गया और पोलैंड पर आक्रमण का मार्ग प्रशस्त हुआ।
युद्ध का आरंभ और धुरी शक्तियों का विस्तार (1939–1941)
यूरोप में युद्ध का आरंभ 1 सितंबर 1939 को जर्मनी के पोलैंड पर आक्रमण से हुआ, जिसमें तीव्र संयुक्त-सशस्त्र रणनीति का प्रयोग किया गया, जिसे "ब्लिट्जक्रीग" (तीव्र युद्ध) के नाम से जाना गया। ब्रिटेन और फ़्रांस ने 3 सितंबर को जर्मनी पर युद्ध की घोषणा की। सोवियत संघ ने 17 सितंबर को पूर्वी पोलैंड पर आक्रमण किया और अक्टूबर के प्रारंभ तक पोलैंड का विभाजन हो गया। नवंबर 1939 में सोवियत संघ ने शीतकालीन युद्ध में फ़िनलैंड पर हमला किया।
1940 के वसंत में जर्मनी ने अप्रैल में डेनमार्क और नॉर्वे पर आक्रमण किया और 10 मई को फ़्रांस तथा निम्न देशों के विरुद्ध विशाल आक्रमण छेड़ा। जर्मन सेनाओं ने आर्देन के जंगलों से होकर फ़्रांस की मैजिनो रेखा को दरकिनार कर दिया और मित्र सेनाओं को बेल्जियम में घेर लिया। ब्रिटिश सेना को मई-जून के अंत में डंकिर्क से खाली किया गया और फ़्रांस ने 22 जून 1940 को युद्धविराम पर हस्ताक्षर किए। इटली ने 10 जून 1940 को युद्ध की घोषणा की। इसके बाद जर्मनी ने ब्रिटेन के विरुद्ध लंबा हवाई अभियान—"बैटल ऑफ़ ब्रिटेन"—छेड़ा, लेकिन लूफ़्टवाफ़े (जर्मन वायुसेना) हवाई वर्चस्व हासिल करने में नाकाम रहा, जो हिटलर की पहली बड़ी विफलता थी और ब्रिटेन पर आक्रमण की योजना अनिश्चितकाल के लिए टल गई।
जून 1941 में जर्मनी ने सोवियत संघ से की गई अपनी संधि का उल्लंघन करते हुए ऑपरेशन बार्बरोसा प्रारंभ किया—इतिहास का सबसे बड़ा सैन्य आक्रमण, जिसमें 30 लाख से अधिक धुरी सैनिक विशाल मोर्चे पर आगे बढ़े। जर्मन सेनाएँ तीव्र गति से आगे बढ़ीं, लेनिनग्राद को घेरा और मास्को तक पहुँची, परंतु सोवियत प्रतिरोध और 1941–42 की कठोर सर्दी के कारण रुक गईं। पूर्वी मोर्चा युद्ध का सबसे बड़ा और सबसे रक्तरंजित रंगमंच बन गया।
प्रशांत क्षेत्र में जापान 1937 से चीन के साथ युद्ध में लिप्त था, जिसमें नानजिंग नरसंहार जैसे कुख्यात अत्याचार हुए। संसाधनों और रणनीतिक प्रभुत्व की तलाश में जापान ने 7 दिसंबर 1941 को हवाई के पर्ल हार्बर स्थित अमेरिकी नौसैनिक अड्डे पर हमला बोला और साथ ही दक्षिणपूर्व एशिया में ब्रिटिश व डच अधिकृत क्षेत्रों पर आक्रमण किया। अमेरिका और ब्रिटेन ने जापान पर युद्ध की घोषणा की और चार दिन बाद जर्मनी व इटली ने अमेरिका पर युद्ध की घोषणा कर दी, जिससे संघर्ष वास्तव में विश्वव्यापी बन गया।
निर्णायक मोड़ (1942–1943)
1942 धुरी शक्तियों के विस्तार के चरम का वर्ष था—जापानी सेनाओं ने फ़िलिपींस, मलाया, सिंगापुर, बर्मा और डच ईस्ट इंडीज़ पर विजय प्राप्त की, जबकि जर्मन सेनाएँ कॉकेशस तक और वोल्गा नदी की ओर बढ़ीं। परंतु अनेक निर्णायक युद्धों ने धुरी शक्तियों की गति बदल दी।
प्रशांत क्षेत्र में जून 1942 का मिडवे का युद्ध निर्णायक सिद्ध हुआ, जिसमें जापान के चार विमानवाहक पोत डुबो दिए गए, जिससे जापानी नौसैनिक वायुशक्ति स्थायी रूप से क्षतिग्रस्त हो गई और रणनीतिक पहल अमेरिका के हाथ आ गई, जिसने अगस्त 1942 से गुआडालकैनाल से जापान की ओर द्वीप-कूच अभियान प्रारंभ किया।
पूर्वी मोर्चे पर अगस्त 1942 से फ़रवरी 1943 तक लड़ा गया स्टालिनग्राद का युद्ध यूरोपीय युद्ध का निर्णायक संघर्ष बना। घेरे में ली गई जर्मन छठी सेना ने भारी हानि के बाद फ़रवरी 1943 में आत्मसमर्पण किया। जुलाई 1943 में कुर्स्क का युद्ध—इतिहास का सबसे बड़ा टैंक युद्ध—के बाद जर्मनी की पूर्व में बड़े आक्रमण करने की क्षमता समाप्त हो गई और लाल सेना लगातार पश्चिम की ओर बढ़ती रही। उत्तरी अफ़्रीका में जनरल बर्नार्ड मॉन्टगोमरी के नेतृत्व में ब्रिटिश सेनाओं ने नवंबर 1942 में एल आलामेन का दूसरा युद्ध जीता, और ऑपरेशन टॉर्च के अंतर्गत मोरक्को व अल्जीरिया में आंग्ल-अमेरिकी उतराई से धुरी सेनाएँ दबाव में आ गईं, जिन्होंने मई 1943 में ट्यूनीशिया में आत्मसमर्पण किया।
यूरोप में मित्र राष्ट्रों की विजय (1943–1945)
जुलाई 1943 में मित्र सेनाओं ने सिसिली और फिर इटली की मुख्य भूमि पर हमला किया। मुसोलिनी को हटा दिया गया और सितंबर 1943 में इटली ने आत्मसमर्पण किया, हालाँकि जर्मन सेनाओं ने देश पर कब्ज़ा कर लिया और युद्ध समाप्ति तक वहाँ लड़ाई जारी रही। मित्र नेताओं—विंस्टन चर्चिल, फ़्रैंकलिन डी. रूज़वेल्ट और जोसेफ़ स्टालिन—ने तेहरान (1943), याल्टा (फ़रवरी 1945) और पॉट्सडैम (जुलाई 1945) सम्मेलनों में रणनीति का समन्वय किया।
6 जून 1944 को—"डी-डे"—जनरल ड्वाइट डी. आइज़नहावर के नेतृत्व में मित्र सेनाओं ने ऑपरेशन ओवरलॉर्ड प्रारंभ किया, इतिहास की सबसे बड़ी जलदल परक उतराई, और नॉर्मैंडी के तटों पर उतरकर पश्चिमी मोर्चा खोल दिया। इसी दौरान सोवियत ऑपरेशन बैग्रेशन ने जर्मन सेना-समूह केंद्र को नष्ट कर दिया और लाल सेना पूर्वी प्रशिया व पोलैंड की सीमाओं तक पहुँच गई। पेरिस अगस्त 1944 में मुक्त हुआ और 1945 के प्रारंभ तक मित्र सेनाएँ जर्मनी में प्रवेश कर चुकी थीं। दिसंबर 1944 में आर्देन में जर्मन अंतिम प्रतिआक्रमण—"द बल्ज का युद्ध"—मित्र प्रगति को रोकने में विफल रहा।
सोवियत सेनाओं ने कड़े नगर युद्ध के बाद अप्रैल 1945 के अंत में बर्लिन पर कब्ज़ा कर लिया। हिटलर ने 30 अप्रैल 1945 को अपने बंकर में आत्महत्या की और जर्मनी ने बिना शर्त आत्मसमर्पण पर हस्ताक्षर किए, जो 8 मई 1945 को प्रभावी हुआ। इस दिन को "यूरोप में विजय दिवस" के रूप में मनाया गया।
जापान की पराजय (1945)
प्रशांत क्षेत्र में अमेरिकी सेनाओं ने 1944 में मेरियाना द्वीपों पर कब्ज़ा किया, जिससे जापान B-29 रणनीतिक बमवर्षकों की पहुँच में आ गया, और युद्ध के सबसे बड़े नौसैनिक युद्ध—लेते की खाड़ी के युद्ध—में विजय प्राप्त की। इवो जिमा (फ़रवरी–मार्च 1945) और ओकिनावा (अप्रैल–जून 1945) की भीषण लड़ाइयों में दोनों पक्षों को भारी हानि हुई और जापानी मुख्य भूमि पर संभावित आक्रमण की भारी कीमत का संकेत मिला।
जापान द्वारा पॉट्सडैम घोषणा के अल्टीमेटम को अस्वीकार करने के बाद, संयुक्त राज्य अमेरिका ने 6 अगस्त 1945 को हिरोशिमा और 9 अगस्त 1945 को नागासाकी पर परमाणु बम गिराए, जिससे अभूतपूर्व विनाश और नागरिक हताहत हुए। 8 अगस्त को सोवियत संघ ने जापान पर युद्ध की घोषणा कर मंचूरिया पर आक्रमण किया। सम्राट हिरोहितो ने 15 अगस्त 1945 को जापान के आत्मसमर्पण की घोषणा की और 2 सितंबर 1945 को टोक्यो की खाड़ी में यूएसएस मिसौरी पर औपचारिक आत्मसमर्पण दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर हुए, जिसके साथ द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त हुआ।
प्रतिभागी और गठबंधन
प्रमुख धुरी शक्तियाँ जर्मनी, जापान और इटली थीं, जिनके साथ हंगरी, रोमानिया, बुल्गारिया, स्लोवाकिया और क्रोएशिया तथा विशी फ़्रांस जैसे सहयोगी राज्य शामिल थे। 1943 के आत्मसमर्पण के बाद इटली मित्र राष्ट्रों की ओर से लड़ा, और 1944 में रोमानिया व बुल्गारिया ने भी ऐसा ही किया।
प्रमुख मित्र शक्तियाँ थीं—ब्रिटेन और उसका राष्ट्रमंडल (कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड, भारत और दक्षिण अफ़्रीका सहित), सोवियत सं
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